किसी भी प्रजातंत्र के लिए एक मझबूत बिपक्ष होना इसको मझबूती प्रदान करती है। विपक्ष की भूमिका निश्चिततौर सकारात्मक होना चाहिए न कि सिर्फ बिरोध के नाम पर बिरोध करना या परिस्तिति को हतियार बनाके राजनीति करना कभी नहीं हो सकता। आज राहुल गांधी के नेतॄत्व में जो हमारे बिपक्ष की एक प्रतिनिधि दल जो का जम्मू कश्मीर दौरा करने का निर्णय किया वह आज संदेह के घेरे में होने केलिए वही बिपक्ष ही जिम्मेदार है। बिगत कुछ दिनों में, जम्मू कश्मीर में धारा 370 को हटाए जाने के बाद इसी बिपक्ष की कुछ प्रमुख नेताओं द्वारा फ़िया गया बयान इसी बात को पुष्टि करता है कि, वहां की शांति से ये सब परीशान है। में ये सोचता हूँ जम्मू कश्मीर की प्रशासन की निर्णय, प्रतिनिधि दल को वापस भेजना सही कदम है।
ये भी हमे सोचने के लिए बाध्य करता है कि आज अचानक राहुल गांधी या कांग्रेस को कश्मीर की इतनी चिंता कैसे हो रही है। ये सब उस दिन कहाँ थे 30 साल पहले जब आधी रात को कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मस्थान छोड़ बाहर चले जाने केलिए बाध्य किया गया था। क्या तब प्रजातंत्र खतरे में नहीं आया था।
बुरहान बानी की मौत के बाद कितनो दिन कश्मीर बन्द रहा, तब राहुल गांधी ये कांग्रेस पार्टी या ये बिपक्ष कहाँ था। जम्मू कश्मीर कहने से कुछ लोग केलिए सिर्फ घाटी हो सकता है पर हमको ये नहीं भूलना चाहिए इसमे बृहत्तर भाग लद्दाख़ और जम्मू भी है, बिपक्ष को ये समझाए कौन। ये कोई पहली बार नहीं है कि कश्मीर में कर्फ्यू लगा है पर राहुल गांधी को दर्द जरूर पहलीबार हो रहा है।
धारा 370 लगाना उस समय का राजनैतिक इस पारिस्तितिक मजबुरी हो सकता है पर अभी इसको हटाना जरूरी एबं साहसिक पदक्षेप था। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री श्री अमित शाह जी के भोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर लिया गया कदम है, जो कि सराहनीय है। देश की और देश बासियों के हित केलिए लिया गया कदम है।
अब लगता है मेरा देश सही हातों में है पर एक मझबूत और सकारात्मक बिपक्ष भी गणतंत्र की मझबूती केलिए बहुत जरूरी है।
प्रदीप्त कुमार दाश
25.08.2019

